गत अंक से आगे.. अधिकतर यह देखा गया है कि जो
व्यक्ति जितने विराट व्यक्तित्व का स्वामी होगा,
उसमें ज्ञान की सम्भावना उतनी ही अधिक होगी. उस व्यक्ति के
लिए हमारा दृष्टिकोण अध्यात्म के आधार पर विकसित होता है. कई बार तो हम ऐसा भी
सोच-समझ लेते हैं कि अमुक व्यक्ति में कोई अदृश्य या दैवीय शक्ति काम कर रही है,
जिससे इस व्यक्ति का व्यक्तित्व इतना चुम्बकीय है, लेकिन अधिकतर ऐसा नहीं होता. महान चरित्र वाले अधिकतर व्यक्ति
परिस्थितियों की उपज होते हैं, जीवन के यथार्थ को समझने वाले
होते हैं. जीवन का यह यथार्थ किसी को एक पल में समझ आता है और कोई इसे लाख कोशिश
करने के बाद भी नहीं समझ पाता. कुछ ऐसे भी होते हैं जो इसे जानते तो हैं, लेकिन समझते नहीं. कुछ ऐसे भी होते हैं जिनका इस यथार्थ से हर पल वास्ता
पड़ता है, मगर यह उनके अहसास का हिस्सा नहीं बन पाता. जीवन के
यथार्थ के विषय में हम जितना चिन्तन करेंगे, उतना ही हम
पायेंगे.
अब यहाँ यह प्रश्न उठना
स्वाभाविक है कि हम जीवन में किसे यथार्थ माने और किसे नहीं? यह एक गम्भीर प्रश्न है और इसी प्रश्न को
सुलझाने के लिए मनुष्य चिरकाल से प्रयत्नशील है. जीवन की वास्तविक स्थिति और
यथार्थ पर उसने आज तक जितना चिन्तन किया है उसके आधार पर उसने अपनी कुछ अवधारणायें
भी बनायीं हैं और काफी हद तक मनुष्य के जीवन को उन अवधारणाओं ने प्रभावित भी किया
है. लेकिन बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम नजरअंदाज कर रहे हैं, और
इसी कारण हमारे मानवीय चिन्तन का उत्कृष्ट पहलू कभी सामने ही नहीं आ पाया है.
बल्कि वक़्त की नजाकत को समझने की अगर हम कोशिश करें तो पता चलता है कि जो कुछ किया
जाना चाहिए था, या होना चाहिए था, सब
कुछ उसके विपरीत किया जा रहा है. ऐसी स्थिति में हम यह निर्धारित नहीं कर पा रहे
हैं कि वास्तविकता क्या है?
जीवन की वास्तविकता को
समझने का जहाँ तक प्रश्न है उसके विषय में भी अनेक मत प्रचलित हैं और हर कोई मत
अपने को दूसरे से श्रेष्ठ बताने की फिराक में है. वह भी बिना किसी तर्क के. जीवन
का यथार्थ और उससे जुड़े हुए पहलूओं को समझने की दिशा में कदम बढ़ाना एक विशद बहस का
हिस्सा हो सकते हैं और होना भी ऐसा ही चाहिए. कुछ लोगों ने कोशिश भी की है, लेकिन अब तक कोई ऐसा सिद्धान्त या दर्शन प्रचलित
नहीं हो पाया जिसमें हम जीवन की वास्तविकता को समझते हुए आगे बढ़ने का प्रयास कर
सकें. हाँ जो कुछ हमारे पास उपलब्ध है वह हमें सकून देता है, कुछ हद तक हमें जीवन को सहज बनाने की तरफ ले जाता है, लेकिन उस सीमा तक नहीं, जिसकी अपेक्षा की जाती है.
यह भी एक सत्य है कि ज्ञान और विज्ञान आज तक इस पहलू को सुलझाने की कोशिश करते रहे
हैं और उन्हें आंशिक रूप से सफलता भी इसमें प्राप्त हुई है.

ज्ञान और विज्ञान के दृष्टिकोण से हम सृष्टि की उत्पति के विषय को
समझने का प्रयास करें तो बात एकदम स्पष्ट हो जाती है. मात्र शब्दों के हेर-फेर के
कारण हमें यह दोनों लगा लगते हैं. यह बात अलग है कि ‘ज्ञान’ को समझने के लिए हमें
‘विज्ञानसम्मत’ चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है. जब तक हम ज्ञान को समझने के लिए
विज्ञान सहारा नहीं लेते तब तक ज्ञान हमारे लिए लाभदायक नहीं हो सकता. हम जीवन में
सबसे बड़ी भूल ही यह करते हैं कि हम ज्ञान और विज्ञान को एक दूसरे का विरोधी मानते
हैं. लेकिन हमें समझना तो यह चाहिए कि विज्ञान ही वह माध्यम है जो हमें ज्ञान की
पराकाष्ठा तक ले जाता है. इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि विज्ञान एक पद्धति है
जिसके माध्यम से हम ज्ञान तक पहुँचते हैं. विज्ञान ही ज्ञान तक पहुँचने का मार्ग
प्रशस्त करता है. शेष अगले अंक में.